Tuesday, April 21, 2009
Tuesday, March 25, 2008
बैंगन (हास्य व्यंग्य कविता)

बात तब की है,
जब सुबह के पांच बजे थे
हम अभी अभी ब्रश करके हटे थे,
कि हमारी परम पूज्य माता जी ने आवाज़ लगाई
मैं एक आग्याकारिणी की भांति उनके पास चली आई
"आज बैंगन बनेंगे " ये आदेश दे कर वे चली गईं
इस आपात कालीन सूचना की खबर पाकर
हम ठगे से रह गए वहीं के वहीं
अभी हम भून ही रहे थे बैंगनों को
कि एक दर्द भरी आवाज़ आई " हमें बचा लो "
हम बैंगन नहीं , हम हैं अफ़्रीका के अशेवत
यहां आग में भूने जा रहे हैंवहां गोलियों से भूनते हैं हमें शवेत
इंसान , इंसान के ही हाथों ख़त्म होता जा रहा है ,
विश्व आज शीत युद्ध में भस्म होता जा रहा है,
आओ लड़ें मिल कर एक अनोखी जंग
जिसका रवैया कर दे हम सबको एक रंग
यही कहते थे मेरे मासूम बैंगन.
मेरे मासूम बैंगन.
... रेणू.
(यह कविता कई गोष्ठियों में सुनी जा चुकी है, और प्रशंसित हो चुकी है, साथ ही काव्यप्रतियोगिता मे प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुकी है.)
Friday, March 21, 2008
रंग गगन गगन

रंग ले मन,
छाई उमंग,
झन झनन झनन,
खन खनन,
उड़ता गुलाल सब लाल लाल, ................सब लाल लाल............!!!
होली के रंग,
उठे मन तरंग,
गुल नार नार ,
आई बहार,
बदहाल हाल, सब लाल .....................सब लाल...............!!!!!!!!!!
भांग संग , उडता जो रंग
कभी रंग संग, कभी रंग भंग
कभी सब हैं संग
रंगे हुए सब बाल टाल, सब लाल लाल........................सब लाल !!!!!!!!!!!
कहीं चुपके रंग,
कहीं उनके संग,
कहीं अलग अलग
कहीं अलख अलख
बजे झमक झमक सुर लय की ताल..........सब लाल.............सब लाल.............!!!!!
बसंत बाद,
फ़ागुन के फ़ाग
बैसाखी साथ
त्योहार राग,
झूमे धरा, झूमे गगन,
रंगे रंगे राधा गोपाल ,..................सब लाल............सब लाल !!!!!!!
रस की फ़ुहार
ब्रज की पुकार
हर नर-नार
मन की चुभन
हुई हनन हनन ले नेह दुशाल ...............सब लाल सब लाल................!!!!!!
कोयल की कूक
हिया हूक हूक
रचे रंग रंग
बेढ़ंगढंग रंग घन-सघन
है सबका हाल...........बस लाल लाल है सबका हाल..........बस लाल !!!!!!!!!
Tuesday, September 25, 2007
चक दे ट्वंटी ट्वंटी

सचमुच रोमांच ,गले पर लटकती तलवार सा मैच
ऐसा अहसास, हर बाल तलवार की धार
जोहानसबर्ग जैसे शतरंज की बिसात
जाने किसे मिलेगी शह और मात
हुई जीत आखिरकार
एक शानदार यादगार
हिन्दुस्तानियों के लिए
गौरव की मिसाल
दिल्ली में जशन का एसा था माहौल
कि लोग लिये सड़्क पर ढोल थाल परात
समझ लो, जो लगा जिसके हाथ..
झूमते गाना "हां वर्ल्ड कप ले लिया"
भला हो उस कैच का जिसने सारा रुख बदल दिया
जाने ये जुनून कैसा है, जिसने सबको एकरंग बना लिया
कि मुंह से रोके ही नहीं रुक रहा ये..."चक दे इंडिया"
-रेणू अहूजा
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चक दे इंडिया वर्ल्ड़ कप २००७

माही भज्जी यूवी जोगिन्दर
ले आए कप घर के अन्दर
जुड़ा इतिहास में नया ताज
जीत लिया फ़िर कप आज
कपिल मदन भी झूमे आज
लार्ड्स की उनको आगई याद
एसा कमाल किया गंभीर
ताने तूने जीत के तीर
जोहानसबर्ग में ट्वंटी ट्वंटी
देश भर में खुशी की घंटी
चमकी फ़िर से देश की शान
किया कमाल अब तूने पठान
वर्ल्ड कप भारत की आन
धड़का मिलकर हिन्दुस्तान
कांटे की टक्कर चाहे मिली थी
यकीं की हममें कमी नही थी
सईंयो माही झूमे जिया
चक दिये फ़ट्टे तूने ईंडिया
मिले दुआ मे करोड़ों हाथ
यही हिंद की जीत का राज़
-रेणू आहूजा
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Wednesday, October 11, 2006
'प्रेम'

गोपी भेंट उद्धव जब आए
सहज ग्यान भंड़ार थे वो
विरह अग्नि की शांति मात्र के
सुलभ साधन मात्र थे वो
कृष्णसखा ने यही सोच कर
भेजा था उद्धव को ही
ग्यान ध्यान से जीत न पाए
कदाचित प्रेम दावानल भी
पर हुई उल्टी ही परिभाषा
भई विजित नेह सरिता
जड़ चेतन में, कण कण में
हर अश्रु और हर नयन में
राधा संग हर गोपी मन में
वाणी के शब्दों से आगे
चक्षु नीर की हदों से आगे
एक समर्पण छाया था
नतमस्तक हो गया ग्यान भी
छवी उभरी कृष्ण मुरारी की
मूक बधिर हुआ ग्यान सिंधु तब
अवचेतन मन हुआ प्रबुद्ध तब
न कोई 'मैं' थी , न कोई' वो' था
न कोई 'अहं' , न ही 'संशय' था
अर्पण समर्पण से सिक्त हुआ सा
सात्विक प्रेम का स्वर्णिम क्षण था
यही प्रेम की संचित भाषा,
यही नेह की अथाह परिभाषा
ग्यान विग्यान दर्शन भी सफ़ल तब
रहे नेह में निष्ठा जब तक.!!!
-रेणू आहूजा.
Wednesday, September 27, 2006
तुम

राधे कृष्णा से कहने लगी एक दिन
कैसे दिल में उतर कर चले आए तुम
पहले अपनें में रहती थी खोई हुई
अब तेरे ख्यालों में रहती हूं गुम
इस दिल का ये आलम कैसे कहूं
मुझ को मुझी से चुरा लाए तुम
अधिकारों का मैने किया था वरण
कर्तव्यों की भूमि पर ले आए तुम
अनजाना सा मैनें था समझा तुम्हें
मुझे अपना बना कर चले आए तुम
पहले मुश्किल थी राहें लगती बड़ी
मुशकिलों को ही राहें बना लाए तुम
कृष्णा कृष्णा थी राधा रटती कभी,
कृष्णा राधे में अंतर हुआ कैसे गुम
समर्पण हो मन का इस तरह
'मैं' ना रहे ना ही रह जाए' तुम'
-रेणू
Wednesday, August 16, 2006
तिरंगे को नमन

तीन रंग का झंड़ा एक ये
क्यूं लगता इतना प्यारा
एसा क्या इस झंड़े में
कुर्बान देश है सारा
रंग केसरी एसा तेजोमयी
दिये एसे सैनानी
मंगल पांड़े, कभी भगतसिंह,
कभी झांसी की रानी
एक एक बूंद लहू की अपनी
दे के वीर मुस्काए,
आज़ादी की सांसें दे हमें
दी अपनी सांसें लुटाए
एसी तिरंगे की ताकत,
वारे लाखों इस पर जाएं
जब भी देश पर आए संकट
वंदेमातरम गाएं
लिये सफ़ेदी मेरा तिरंगा
शांति गीत जब गाए
भारत ही क्या,इस पर सारी
धरा कुटुंब बन जाए
लिये खुशहाली रंग हरियाली,
लहरा खेतों से से आए,
झूमझूम महक माटी की
तिरंगा दे बतलाए
हर जन,हर गण,
हर मन वंदन करे भारती गान
'वंदे मातरम ' दो शब्दों में
दमके हिंद की शान
एसा तिरंगा जादू भरा ये
जब जब है लहराता
हर बोली हर धर्म का
संगम दुनिया को दिखलाता
बंग, मराठी, उत्कल सिधी,
जो नदिया की मौजें,
कशमीर,हिमाचल,बुंदेले
सब एक धारा में सोचें
नहीं अलग हम,
जय हिंद गणतंत्रम
वेद संस्कृति संगम
एक ही धुन मे बोलें
मिल कर वंदे, वंदेमातरम....!

